श्री कल्पादि जैनागमों में अष्टांग निमित्त में 'स्वर' को एक प्रधान अंग माना गया है l हठयोग प्राणायाम से सिद्ध होता है और प्राणायाम स्वरोदय साधना के बिना अधूरा रह जाता है l मात्र इतना ही नहीं ज्योतिषी भी स्वरोदय ज्ञान के आभाव में लंगड़ा है l स्वरोदय ज्ञान द्वारा श्वास की परख कर ही ज्योतिषी प्रश्नो का सही समाधान देने में समर्थ हो पाता है l
वही पुत्र को ही उत्तराधिकारी स्वीकार किया जाता है I इसलिए हिन्दू दम्पति को पुत्री विहीन रहना मंजूर है मगर पुत्र के बिना वे चिंतित एवं परेशान हो जाते है I इससे उनकी व्यक्तिगत संतुष्टि के साथ- साथ सामाजिक प्रतिष्ठा भी जुडी हुई है I
मनुष्य केवल उनका आविष्कार करता है I
वे इस्लामी आक्रांताओं द्वारा अन्य संस्कृत वाङ्गमय के साथ ही नष्ट कर दिए गए थे l उनमे से आज केवल यवनाचार्य - विरचित स्त्रीजातक मात्र ही उपलब्ध है l
I feel that the series of Astrological Manuals now before the public would be incomplete if it did not include one dealing with this branch of the subject
Notebandi 50 Din [Hindi] Aparna Sharma श्री कल्पादि जैनागमों में अष्टांगNotebandi 50 Din [Hindi] by Prakash Biyani Publisher: Indra Publishing Books , l " " l , l l , ' ' l l ( ) , l , , l l , l l ' , l , l l , , , , " ' ' .!